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Thursday, March 19, 2020

Kanshiram (कांशीराम) -बहुजन नायक


बाबा साहेब के मिशन को आगे ले जाने का कार्य  यदि किसी ने किया है तो एक ही नाम स्मरण होता है "मान्यवर कांशी राम" l मान्यवर जी का सम्पूर्ण जीवन त्याग, समर्पण व संघर्ष की एक मिसाल रहा है l मान्यवर कांशीराम जी ने तेरह रुपये की रबड़ की चप्पल पहनकर चले, उन्होंने भारतीय राजनीति को फिर से परिभाषित किया या यूँ कहें भारतीय राजनीति का एक अलग मुहावरा गढ़ा l बाबा साहेब के सपनों को पूरा करने के लिए मान्यवर साहेब सब कुछ त्याग कर भारत भ्रमण करते रहे और जीवन भर अपने घर नहीं गए l मान्यवर जी का जन्म 15 मार्च 1934, ग्राम खबासपुर, जिला रोपड़ पंजाब में हुआ l कांशीराम जी के पिता का नाम हरिसिंह और माता का नाम बिशन कौर था l मान्यवर कांशीराम जी ने मात्र 22 वर्ष की उम्र में सन 1956 में भौतिकी और रसायन शास्त्र विषय लेकर रोपड़ के ही गवर्नमेन्ट कॉलेज से स्नातक उपाधि प्राप्त की l

इस विशिष्ट योग्यता के आधार पर ही मान्यवर श्री कांशीराम जी को डिफेंस रिसर्च एण्ड डिज़ाइन आर्गेनाइजेशन (डी.आर.डी.ओ.) की महाराष्ट्र में पुन स्थित विस्फोटक अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (ई.आर.डी.एल.) में 'अनुसंधान अधिकारी' के पद पर नियुक्ति मिली l

1962 - 63 में मान्यवर जी ने अपने कार्यालय में जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त वरिष्ठ अधिकारीयों द्वारा बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर जयंती एवं बुद्ध जयंती का अवकाश निरस्त किये जाने का तीव्र विरोध किया l इस भेदभाव पूर्ण रवैये से अनुसूचित जाति के कर्मचारियों में आक्रोश तो था लेकिन विरोध करने का साहस नहीं था क्योकि ये वरिष्ठ अधिकारीयों से डरते थे ऐसी हालत में दीनाभान नामक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ने इस निर्णय का विरोध किया l दीनाभान राजस्थान का निवासी था और उसे निलंबित कर दिया गया l दीनाभान के निलंबित होते ही कांशीराम बेचैन हो उठे और उस कर्मचारी के घर जा पहुंचे l दीनाभान ने मान्यवर कांशीराम जी को बाबा साहब की लिखित पुस्तक दी जिसका नाम था "जाति भेद का उच्छेद" जिसे पढ़कर मान्यवर कांशीराम जी बहुत ही प्रभावित हुए और दीनभान के केस को कोर्ट में ले गए और दीनभान को न्याय दिलाने में कामयाब हुए, बाबा साहब अम्बेडकर जयन्ती और बुद्ध जयन्ती पर अवकाश पुनः लागू किया गया और दीनभान को नौकरी पर पुनः बुलाया गया बस यही से मान्यवर जी मनुवादियों के अत्याचारों को रोकने के लिए तथा बाबा साहब के मिशन को आगे बढ़ाने का एक दृढ़ संकल्प लिया l अपनी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया और चल पड़े सोती कौम को जगाने, हलाकि अभी उनके साथ दूर-दूर तक कोई नहीं नज़र आ रहा था पर उन्होंने अपना संघर्ष जरी रखा l इसी बीच उनकी मुलाकात बहन कु. मायावती से हुई l जिन्होंने भी मान्यवर जी का कदम से कदम मिला कर साथ दिया l

मान्यवर कांशीराम जी बाबा साहेब के विचारों से काफी प्रभावित हुए खास तौर से 18 मार्च 1956 में शोषितों व उपेक्षित लोगों के लिए दिए गए मार्मिक भाषण से जिसमें बाबा साहेब ने कहा था कि

".... मेरे ज्यादा समय पढाई-लिखाई के मामले में, रिजर्वेशन के मामले में तथा हमारे समाज में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील व अधिकारी पैदा हो, इस काम में लग गया है l लेकिन मैं आज देख रहा हूँ कि ये पढ़े-लिखे कर्मचारी तो एक अगल क्लास (वर्ग) बनकर रह गए है और इनकी हमारे सामने क्लर्कों की एक फ़ौज खड़ी हो गयी है जो कि अपने स्वार्थ के आगे कुछ भी देखने को तैयार नहीं है l अपने गरीब और पीड़ित भाइयों-बहनों के बीच जाकर, उनके उत्थान के लिए काम करने के बजाय, ये लोग सिर्फ अपना पेट पालने में लगे हुए है...."

काफी अध्ययन के बाद मान्यवर कांशीराम जी इस नतीजे पर पहुंचे कि इस देश में फैली सड़ी-गली ब्राह्मणवादी व्यवस्था एक ही औषधि से ध्वस्त की जा सकती है वह है देश में फैली छः हज़ार सात सौ सैंतालिस जातियां जो टुकड़ों में बंटी है वह केवल एक जुट हो जाये और इस संगठन रुपी औषधि को तैयार करने में ज्यादा समय नहीं लगा लेकिन यह औषधि जन-जन को पिलाने में मान्यवर जी ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और यह औषधि जिन लोगों ने पी ली वे स्वास्थ्य हो कर जीवन जीने लगे और जिन्होंने ने नहीं पी वह आज भी बीमार नज़र आ रहे है l

6 दिसम्बर, 1978 को दिल्ली में मान्यवर श्री कांशी राम जी ने देश भर से आये शिक्षित कर्मचारियों को इकठ्ठा कर एक सम्मलेन में "बामसेफ" की विधिवत घोषणा की l बामसेफ/BAMCEF यानि (All-India Backward (SC.ST.OBCs) And Minority communities Employees Federation ) l बामसेफ की सफलता के बाद संघर्ष करने के लिए 6 दिसम्बर 1982 को "दलित शोषित समाज संघर्ष समिति" अर्थात डी.एस-4 का गठन किया l

एक बार मान्यवर जी का बहुजन संगठन नामक पेपर बंद हो गया तब मान्यवर कांशीराम जी के पास एक उद्योग पति आये और बोले मैंने आप के सहयोग के लिए कुछ पैसा देना चाहता हूँ लेकिन मान्यवर जी ने पैसा लेने से इंकार कर दिया और बोलो "अगर मैं आज आप से पैसा ले लेता हूँ तो मुझे आप के इशारे पर काम करना पड़ेगा इसलिए आप यहाँ से चले जाएँ l इसके पश्चात मान्यवर जी ने इलाहाबाद में एक सभा बुलाई और लोगों से कहा कि अगर हमारा बहुजन संगठन बंद हो जायेगा तो हमारा भी जिन्दा रहना बेकार है l उसी समय बहुजन समाज की बहनों ने अपने अपने गहने उतार कर मान्यवर जी के चरणों में डाल दिए l

मान्यवर श्री कांशी राम जी ने 14 अप्रैल 1984 यानि बाबा साहेब के जन्मदिन के मौके पर अपनी अध्यक्षता में "बहुजन समाज पार्टी" की स्थापना की l पहली बार 1992 में इटावा, उत्तर प्रदेश से और दूसरी बार 1996 में होशियारपुर पंजाब राज्य से लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए तथा 1998 में उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद भी बने l बाबा साहेब डा० बी० आर० आंबेडकर जी ने हमें वोट का अधिकार दिलाया और मान्यवर जी ने उसे प्रयोग करने का सही तरीका बताया l

ऐतिहासिक पुरुष मान्यवर कांशीराम जी 24 घंटे में 18 घंटे पार्टी को देकर सामाजिक परिवर्तन की लहर को काफी आगे बढ़ाया l लेकिन मनुवादियों ने मान्यवर जी की राह में तमाम तरह के रोड़े बिछाए लेकिन मान्यवर जी अपने प्रयासों से कभी भी विचलित नहीं हुए, उनका प्रयास एक विकलांग समाज को बदलने का था बीमार समाज को बीमार रहते हुए भी दिन रात उस समाज का उपचार करते रहे ऐसे ऐतिहासिक पुरुष को भुलाया नहीं जा सकता l

आज-कल हम देखते है कि अधिकतर राजनेता लिखा हुआ भाषण पढ़ते है पर मान्यवर जी की यह खासियत थी कि वह कभी तैयार किया हुआ भाषण नहीं सुनाया, कहा जाता है कि उनका माइंड कम्प्यूटर था वह जिस कार्यकर्ता से एक बार मिल लेते थे तो वह चाहे कितने दिनों बाद मिले शीघ्र ही उनका नाम पुकार कर गले लगा लेते थे l हर बात उन्हें याद रहा करती थी l

मान्यवर जी कहते थे कि, हमारे साथ वही लोग चल सकते है जिन्हे न धूप की चिंता हो और न पेट की l मुझे ऐसे लोगों की जरुरत नहीं है जो छाँव की तलाश में रहे और जिस अपने पेट की चिंता हो l हमें भारत में आज़ादी लानी है इस लिए सामाजिक प्रबोधन और वैचारिक क्रांति की जरुरत है l जो सम्मान और अपमान की परवाह न करते हुए अखंड क्रियाशील रहेगा वही समाज में परिवर्तन ला सकता है l

मान्यवर जी ने अपना सारा जीवन बाबा साहेब के मिशन को आगे ले जाने में लगा दिया, और सफल भी हुए l उनकी सफलता बहुजन समाज पार्टी के रूप में देखने को मिलती है l

15 सितम्बर, 2003 को आन्ध्र प्रदेश के जिला पशिचमी गोदावरी स्थित भीमावरम की जनसभा को संबोधित करने के बाद नरसापुर एक्सप्रेस ट्रेन से हैदराबाद लौटते हुए, मान्यवर जी को रास्ते में ही ब्रेनस्ट्रोक हुआ l मान्यवर कांशीराम जी डायबिटीज और ह्रदय रोग से भी पीड़ित थे l

हर किसी को एक न एक दिन मरना है, हर किसी को एक-न-एक दिन मौत आनी ही आनी है, और फिर इसी क्रम में मान्यवर श्री कांशीराम जी का 9 अक्तूबर, 2006 को मृत्यु हो गई, उनके निधन से राष्ट्र ने एक अमूल्य नेता खो दिया है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है l उस समय पूरे देश में एक शोक लहर छा गयी थी क्योकि उनके अनुयायी देश भर में थे और अब उन्हें "बहुजन नायक" के रूप में याद किया जाता है l

फौलादी इरादों और कठोर परिश्रम के प्रतीक, चट्टान की तरह दृढ़, आजीवन विवाह न करके सम्पूर्ण बहुजन समाज को अपना परिवार बनाकर उनके उद्धार और उत्थान के लिए पूरा जीवन निछावर करने वाले मान्यवर कांशीराम जी को देश का बच्चा-बच्चा नमन करेगा, इतना त्याग शायद अन्य इंसान में होना कठिन बात है l यह कुर्बानी बहुजन समाज की आज़ादी का प्रारूप है l

कांशी राम आप की नेक कमाई l
आप ने सोती कौम जगाई l l

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