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Tuesday, June 13, 2017

माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्वशीलता का अध्ययन- SYNOPSIS PREPARED


प्रस्तावना-
नेतृत्व अर्थात लीडरशिप एक ऐसा शब्द है दिमाक में आते ही राजनीतिज्ञ अथवा राजनीति का बोध कराता है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। इसका दायरा असीमित है। नेतृत्व समाज में अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ही समाज की विविध क्षेत्रों जैसे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक एवं शैक्षिक आदि में एक नवीन परिवर्तन आता है। बिना नेतृत्व के कोई भी देश हो, समाज हो या संस्था हो सुचारू रूप से विकास या उन्नति नही कर सकते हैं। सभी को एक कुशल नेतृत्व व नेतृत्वकर्ता की आवश्यकता होती है। नेतृत्वकर्ता रेलगाड़ी के इंजन की तरह होता है, अगर वह अपना संतुलन व गति ठीक बनाये रखता है तो रेल गाड़ी अपने गंतव्य तक सुचारू रूप से पहुँच जाती है परन्तु इसकी विपरीत स्थिति होने पर रेलगाड़ी गंतव्य तक पहुँचने में असफल रहती है।
ठीक इसी प्रकार किसी भी देश, समाज या संसथान की बागडोर उसकी नेतृत्वकर्ता पर आधारित होता है। वह ही अपने जिम्मेदारियों को सही ढंग से समझते हुए अपने साथियों को उचित मार्गदर्शन कर अपने देश, समाज और संस्था को उन्नति के शिखर पर पहुँचा सकता है।

कालेज ये विद्यालय एक सामाजिक संस्था है जहाँ शिक्षक तथा अन्य कर्मचारी एक संगठित समूह के रूप में शैक्षिक कार्य में व्यस्त रहते हैं और अपने अपने कार्यों का वहन करते हैं। परन्तु जब शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता शब्द की बात आती है तो यह एक ऐसे व्यक्ति की ओर संकेत करता है जो प्रबंधात्मक पदवी पर है; जैसे विश्वविद्यालय का कुलपति, कॉलेज का प्रधानाचार्य, विभागाध्यक्ष, संस्था का निदेशक, विद्यालय का प्रधान अध्यापक, पर्यवेक्षक, निरीक्षक आदि।
इन सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर संस्थागत लक्ष्यों को प्राप्त करने का दायित्व है, अतः वे नेता के रूप में जाने जाते हैं।
माध्यमिक विद्यालयों में भी शिक्षक तथा विद्यालय के कर्मचारी अपने अपने उत्तरदायित्यों का वहन करते रहते हैं जिनका नेतृत्व विद्यालय का प्रधानाध्यापक करता है और उसका नेतृत्व तभी सफल माना जाता है जब सभी शिक्षक व कर्मचारी उसकी योग्यता, अनुभव, कार्यकुशलता तथा ज्ञान से प्रभावित होकर उसे सहयोग देते हैं और उसके आदेशों का हृदय से स्वागत करते हैं। उसकी योजनाओं को वे मन से स्वीकारते हैं, उसे सफल बनाने के लिए तत्पर रहते हैं।
प्रधानध्यापक भी अपनी समस्त कर्मचारियों व सहयोगियों की योग्यता, क्षमता, अनुभवों और विचारों का स्वागत करता है, उन्हें सम्मान देता है, उनको सुनता है व उनकी समस्यायों को सुलझाने में उनका मार्गदर्शन करता है तथा उनकी भूलों को सुधारने में सहयोग करता है। प्रधानाध्यपक विद्यालय की सभी जिम्मेदारियों को उचित कौशल व योग्यता के साथ वहन करता है।

प्रधानाध्यपक विद्यालय का नेता होता है, वह विद्यालय के समस्त व्यक्तियों के लिए आदर्श होता है। जिस प्रकार किसी भी समिति का मुखिया उसका सर्वेसर्वा होता है और उसके समस्त कार्यकर्ता उसका अनुसरण करते हैं और वे समिति को उन्नति की ओर ले जाते हैं और सन्निहित लक्ष्यों व उद्देश्यों की प्राप्ति करते हैं।
नेतृत्व शीलता का गुण व्यक्ति के समस्त पक्षों को प्रभावित करता है। नेतृत्व एक प्रक्रिया व दशा है जिसमे कोई व्यक्ति सामाजिक प्रभाव के द्वारा अन्य लोगों की सहायता लेते हुए एक सर्वनिष्ट कार्य सिद्ध करता है। शासन करना, निर्णय लेना, निर्देशन करना, आज्ञा देना आदि सब एक कला है, एक कठिन तकनीक है परन्तु अन्य कलाओं की तरह यह एक नैसर्गिक गुण है। प्रत्येक व्यक्ति में यह गुण या कला समान नही होती है। प्रबंधक एक कुशल नेतृत्व कर्ता के रूप में अपने सहयोगी कर्मचारियों से अपने निर्देशानुसार, योग्यतानुसार और क्षमतानुसार ही कार्य करवाता है। जैसा प्रबंधक का व्यवहार होता है, जैसे उसके आदर्श होते है, उसके कर्मचारी भी समतुल्य वैसे ही वयवहार निर्धारित करते हैं। इसलिए प्रबंधक का नेतृत्व जैसा होगा, कर्मचारी भी उसी के अनुरूप कार्य करेंगे।

प्रधानाध्यापक विद्यालय का मुखिया होता है। उसका व्यक्तित्व गुणों से विभूषित होना चाहिए। उसके व्यक्तित्व में सभी गुण विद्यमान होने चाहिए जो एक कुशल नेतृत्वकर्ता के लिए आवश्यक होते हैं क्योंकि उसके अनुकूल नेतृत्व पर ही विद्यालय किए सम्पूर्ण व्यवस्था व संचालन निर्भर करता है। कुशल नेतृत्व के आभाव में कोई भी संगठन न तो व्यवस्थित रूप से चल सकता है और न ही अपनी पूर्ण संरचना प्राप्त कर वांछित लक्ष्यों की पूर्ति की दिशा में प्रगति कर सकता है। कुशल नेतृत्व के आभाव में किसी भी संगठन की स्थिति कटी हुई पतंग की तरह होता है जो उद्देश्यहीन होकर आसमान में इधर उधर भटकते हुए जमीन पर आ गिरती है।
प्रस्तुत शोध में माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्वशीलता का अध्धयन किया जा रहा है जो वर्तमान में एक महत्वपूर्ण विषय है।


तकनीकी शब्दों का परिभाषीकरण
माध्यमिक विद्यालय:-
माध्यमिक शब्द का अर्थ है- ‘मध्य की’ अर्थात् माध्यमिक शिक्षा, प्राथमिक और उच्च शिक्षा के मध्य की शिक्षा है। अंग्रेजी में इसके लिए सेकेंडरी (Secondary) शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसका अर्थ है दूसरे स्तर की। पहले स्तर की प्राथमिक और उसके बाद दुसरे स्तर की सेकेंडरी शिक्षा। आज किसी भी देश में माध्यमिक शिक्षा, प्राथमिक और उच्च शिक्षा के बीच की कड़ी होती है। और अपने में पूर्ण इकाई होती है। यह बच्चों के निर्माण की शिक्षा है।
हमारे देश में माध्यमिक शिक्षा का श्री गणेश ईसाई मिशानिरियों ने किया। उन्होंने प्राथमिक विद्यालय खोले, तदुपरांत प्राथमिक शिक्षा प्राप्त बच्चों के लिए माध्यमिक विद्यालय खोले।

प्रधानाध्यापक:-
प्रधानाध्यापक अंग्रेजी शब्द प्रिंसिपल (Principal) का हिंदी रूपांतरण है। प्रधानाध्यापक शब्द दो शब्दों प्रधान + अध्यापक से मिलकर बना है इसका अर्थ है विद्यालय के समस्त अध्यापकों में पद में सबसे बड़ा या प्रमुख।
विद्यालय में प्रधानाध्यापक का पद अत्यंत महत्वपूर्ण तथा उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। वह विद्यालय का सर्वोच्च अधिकारी होता है। किसी भी विद्यालय की उन्नति और अवनति में इसके प्रधानाध्यापक की बहुत बड़ी भूमिका होती है। वह विद्यालय का केंद्र होता है जिसके चारों ओर विद्यालय की समस्त गतिविधियाँ घूमती रहती हैं। उसके सभी क्रियाकलापों का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से विद्यार्थियों, अध्यापकों व अन्य कर्मचारियों पर पड़ता है। अतः विद्यालय की प्रधानाध्यापक को आदर्श होना चाहिए। प्रधानाध्यापक की योग्यता, सोच एवं प्रशासकीय क्षमता पर ही विद्यालय की प्रगति निर्भर करती है।
पी.सी. रैन ने विद्यालय में प्रधानाध्यापक के स्थान के सम्बन्ध में निम्नलिखित विचार प्रकट किये हैं।
“घड़ी में प्रधान कमानी, मशीन प्रचक्र या जलयान में यंत्रीकरण को जो स्थान प्राप्त है वही स्थान किसी भी विद्यालय में प्रधानाचार्य का है।“
नेतृत्वशीलता:-
नेतृत्वशीलता को अंग्रेजी में लीडरशिप (Leadership) कहते हैं। विद्वानों ने नेतृत्व शीलता को भिन्न भिन्न प्रकार से स्पष्ट किया है। कभी कभी इसका अर्थ प्रसिद्धि से समझा जाता है। लोकतान्त्रिक दृष्टि से इसका अर्थ उस स्थिति से समझा जाता है जिसमे कुछ व्यक्ति स्वेच्छा से दूसरे व्यक्तियों के आदेशों का पालन कर रहें हों और कभी कभी कोई व्यक्ति शक्ति के आधार पर दूसरों से मनचाहा व्यवहार करवा लेने की क्षमता रखते हों तो उसे भी नेतृत्व के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है।
वास्तव में नेतृत्व का अर्थ है आगे आगे चलना। जो व्यक्ति कार्य को पूरा करने के लिए तथा दूसरों के मार्गदर्शन के लिए आगे चले, वही नेता है। अतः लोगों को अपने निर्देशानुसार चलाने की क्षमता ही नेतृत्व शीलता होती है।
अनुसंधान के उद्देश्य:-
शोध कत्री द्वारा अनुसंधान के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये गए हैं-
१.     माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करना।
२.     शहरी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाधयापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करना।
३.     ग्रामीण माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करना।
४.     ग्रामीण तथा शहरी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करना।
५.     सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करना।
६.     निजी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करना।
७.     सरकारी व निजी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का तुलनात्मक अध्ययन करना।
सम्बंधित साहित्य का अध्ययन:-
नेतृत्व गुणों के सम्बन्ध में हुए कार्य:-
नेतृत्व गुणों के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों द्वारा शोध कार्य किये गए हैं-
बी.जी. सुधा, सी.डी. शिवकुमार स्वामी (१९९१)
उद्देश्य:-
प्राथमिक और हाई स्कूल के अध्यापकों की क्षमता पर संगठनिक परिवेश के प्रभाव की जांच करना।

निष्कर्ष:-
·        समक्षता के कुछ विशेष आयामों जैसे सम्प्रेषण और अंतःक्रिया की दृष्टि से अध्यापिकाएं अध्यापकों से अधिक सक्षम थीं।
·        प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के मूल्यांकन की क्षमता माध्यमिक विद्यालय के अध्यापकों से अधिक थी।
·        मुक्त परिवेश सभी प्रकार की सक्षमताओं के लिए अन्य परिवेश से अधिक अनुकूल पाया गया।
पूनम अग्रवाल (१९९४)
निष्कर्ष:-
·        माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापको का नेतृत्व व्यवहार सामान्य से उच्च स्तर का पाया गया।
·        माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक अपने कार्य से संतुष्ट पाए गए।
·        माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक कार्य संतुष्टि के क्षेत्र आर्थिक पक्ष एवं भावी उन्नति के अवसर से संतुष्ट पाए गए।
·        सरकारी व निजी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापकों के नेतृत्व व्यवहार की तुलना करने पर सार्थक अंतर पाया गया।
     थॉमस माइकल (१९९५)
इन्होने अपने अध्ययन में निम्न निष्कर्ष दिए-
·        ये अध्यापकों के वातावरण में सुधार पर बल देते हैं।
·        छात्रों के कक्षागत वातावरण में सुधार पर बल देने की बात कही।
विजय कुमार व्यास (१९९९)
इन्होने अपने शोध के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि-
·        प्रधानाध्यापक का साक्षात्कार लेने पर शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के प्रधानाध्यापक कार्योंन्मुखी पाए गए, अर्थात प्रधानाध्यापक स्वयं को कार्योंन्मुखी कहते हैं।
·        ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालय में कार्यरत प्रधानाध्यापक का प्रबंधकीय व्यवहार कार्योंन्मुखी बताते हैं जबकि शिक्षकों के अनुसार प्रधानाध्यापक का प्रबंधकीय व्यवहार कार्यकर्तोंमुखी है।

प्रतिमा सिंह (२०१४)
निष्कर्ष:-
शोधकत्री के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली को जानने का रहा। इनके निष्कर्ष निम्नलिखित हैं-
·        ग्रामीण तथा शहरी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शीलता में अंतर पाए गये।
·        निजी और सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शीलता में अंतर पाए गये।
परिकल्पना:-
प्रस्तुत शोध में शोध कार्य से पूर्व अधोलिखित परिकल्पना निश्चित की गई है।
·        ग्रामीण तथा शहरी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली में कोई सार्थक अंतर नही होता।
·        सरकारी तथा निजी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों के नेतृत्व शैली में कोई सार्थक अंतर नही होता।
   

शोध अभिकल्प:-
किसी भी शोध के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आवश्यक है की शोध की प्रकृति के अनुरूप ही विधि प्राविधि एबम उपकरण हो। इसके आभाव में यह तथ्यहीन होता है। शोध अभिकल्प से तात्पर्य उस मार्ग से है जिस पर चलकर शोध से सम्बंधित सत्य की खोज की जा सके।
प्रस्तुत शोध के लिए सर्वेक्षण विधि का चयन किया गया है। सर्वेक्षण विधि द्वारा तथ्यों को अधिक तर्क संगत रूप से रखा जा सकता है। यह विधि किसी व्यक्ति विशेष से सम्बंधित न होकर समूह सम्बंधित होती है और इसमें अधिक से अधिक लोगों को सम्मिलित किया जा सकता है जिससे की आंकड़ो में विश्वसनीयता का प्रतिशत बढ़ जाता है।
न्यादर्श:-
माध्यमिक स्तर पर प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली का अध्ययन करने के लिए दस विद्यालयों का चयन करेंगे। प्रस्तुत शोध कार्य में स्तरीकृत यादृच्छिक न्यादर्श प्रणाली से न्यादर्श का चयन किया जायेगा। इसमें कुल दस विद्यालय तथा प्रत्येक विद्यालय से दस दस अध्यापकों को चयन किया जायेगा।

न्यादर्श
ग्रामीण अध्यापक

शहरी अध्यापक









निजी विद्यालय के अध्यापक
निजी विद्यालय के अध्यापक
सरकारी विद्यालय के अध्यापक
सरकारी विद्यालय के अध्यापक






चर:-
नियंत्रित चर
आश्रित चर
स्वतंत्र चर
माध्यमिक विद्यालय
प्रधानाध्यापक
नेतृत्व शीलता
     
शोध उपकरण:-
तथ्यपूर्ण सामग्री या दत्त जो अब तक अज्ञात है उनका अध्ययन ही महत्वपूर्ण है जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक प्रकार के अनुसन्धान के लिए नवीन दत्त संकलित करने के लिए अथवा नवीन क्षेत्र का उपयोग करते हुए कतिपय यंत्रों अथवा उपकरण की आवश्यकता होती है। इन्ही यंत्रों को उपकरण कहा जाता है।
प्रस्तुत अध्ययन में शोध कत्री द्वारा स्व निर्मित उपकरण का प्रयोग किया जायेगा। प्रधानाध्यापकों की नेतृत्व शैली जानने हेतु रेटिंग्स का निर्माण किया जायेगा।

संभावित निष्कर्ष:-
प्रस्तुत शोध में माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापकों की भूमिका व नेतृत्व शीलता का अध्ययन किया जायेगा तथा आंकड़ों के आधार पर तथ्यों को प्रस्तुत किया जायेगा। शोध में ग्रामीण तथा शहरी, निजी व सरकारी प्रधानाध्यापकों के उत्तरदायित्व व नेतृत्व शीलता का तुलनात्मक अध्ययन द्वारा निष्कर्ष प्रस्तुत किये जायेंगे।

अध्ययन की परिसीमाएं:-
अल्प समयावधि में व्यापक अध्ययन दृष्टि से समस्या का सीमांकन अति आवश्यक है जिससे अनुसंधानकर्ता आवश्यक श्रम एवं संकलन से बच सकता है। प्रस्तुत अध्ययन को निम्नांकित प्रकार से परिसीमित किया जायेगा।
·        क्षेत्र की दृष्टि से-
§  प्रस्तुत अध्ययन कानपुर के चकेरी क्षेत्र के माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापक एवं अध्यापिकयों तक सीमित किया जायेगा।
§  अध्ययन में ग्रामीण तथा शहरी माध्यमिक विद्यालयों को सम्मिलित किया जायेगा।
§  अध्ययन में निजी व सरकारी माध्यमिक विद्यालयों को सम्मिलित किया जायेगा।
·        प्रतिदर्श सम्बंधित परिसीमन:-
प्रस्तुत अध्ययन में न्यादर्श का चयन सेवाकाल, जाति, अनुभव आदि आधारों पर हो सकता है परन्तु समय और साधनों की सीमितता के कारण प्रतिदर्श में माध्यमिक विद्यालयों के १०० अध्यापक/ अध्यापिकयों तक सीमित है।

·        विद्यालय की दृष्टि से:-
प्रस्तुत अनुसन्धान में ऐसे अध्यापक/ अध्यापिकाओं का चयन किया जायेगा जो ग्रामीण तथा शहरी माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षणरत हैं।

लघु शोध प्रबंध की प्रस्तावित संक्षिप्त रूपरेखा:-  
प्रथम अध्याय:- प्रस्तावना, तकनीकी शब्दों का परिभाषीकरण, अनुसन्धान के उद्देश्य
द्वितीय अध्याय:- सम्बंधित साहित्य का अध्ययन, परिकल्पना, शोध अभिकल्प
तृतीय अध्याय:- न्यायदर्श, चर, शोध उपकरण
चतुर्थ अध्याय:- संभावित निष्कर्ष, अध्ययन की परिसीमाएं
परिशिष्ट:- सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
  
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-
Borg Walter, R                  “Educational Research an Introduction New                                                                     York Longmans, Green & Co, Ltd. 1963.             Fox, DJ.                        “The Research Process in Education”, New York,
                                          Halt Rinehart and Winstons, 1969.
Gadgil, D.R. (1965)         Women in the working force in India, Asia
                                         Publishing House, Bombay
 Good, C.V.(1945)           “Dictionary of education”. Mc Graw Hill Boom
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गैरेट हेनरी, ई.         “शिक्षा एवं मनोविज्ञान में सांख्यिकी हिंदी अनुवाद”
                     कल्याणी पब्लिशर्स, लुधियाना
कपिल, एच.के.         “अनुसन्धान विधियाँ” हर प्रसाद भार्गव पुस्तक

                     प्रकाशन, आगरा १९८१

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