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Thursday, April 5, 2012

आरक्षण एक जरूरी पहल



कोई अगडी या ऊची जाति का यह इसलिये उसमे प्रतिभा है ये कोई पैमाना नहीं है , अगर वास्तब में येसा होता तो संविधान निर्माण के समय सबसे योग्य डा. भीमराव आंबेडकर को ही क्यों माना जाता, येसे संविधान के निर्माण की जिम्मेदारी जो विविधताओ से भरे देश में , विकासोन्मुख हो , और हर वर्ग और हर जाति का सम्मान हो सके, |
दुःख तो तब होता है जब लोग यह कहते है कि अयोग्य व्यक्ति को जिम्मेंदारी का पद मिलता जिससे देश का भविष्य खराब होता है और दांव पर लगता है, इसमे मै कहना चाहूँगा कि आरक्षण तो आजादी के बाद की पहल है,,इसके पहले पूरी सत्ता तो इन्ही के हाथ में थी,,,इन्होने देश को अंग्रेजो के हाथ बेच दिया ,,,विलासिता में जीबन जिया ,,,,,समाज के बहुत बड़े हिस्से हो उपेक्षित रखा,,,उस समय इनके अंदर सात्विक बिचार नहीं आये,,,शासन करना अपना पैत्रिक अधिकार समझते थे,,,जिस समय पूरा योरोप विकास और क्रांति का बिगुल बजा रहा था उस समय ये अन्धविश्वास और विलासिता के मद में डूबे हुए थे,,,आज आरक्षण की मदद से जब वही उपेक्षित वर्ग विकास कर रहा और देश के विकाश में अतुलनीय योगदान दे रहा है,,,उन्हें बुरा लग रहा है|
मुझे जो समझ में आता है और जो कडुई हकीकत है,,,वह यह कि,,पहले इनके सामने कोई प्रतियोगिता नहीं थी,,यही राजा थे,,यही शासक थे,,,इन्हें हर पद और विलासिता वरासत में मिलती थी,,,पर आज प्रतियोगिता करना पड़ता है,,,उनसे कही जादा योग्य छोटी जाति का लड़का आगे निकल जाता है,,तो बात गले से नीचे नहीं उतरती. सहन नहीं होता.
आरक्षण के बावजूद आज भी किसी दफ्तर और कार्यालय में छोटी जाति की भागीदारी बहुत कम है,,,और उनकी कम संख्या के कारण उनके ऊपर बहुत दबाव होता है,,,ऊची जाति के तुलना में जादा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ होते है,,,क्योकि उनके पास न तो कोई बड़े राजनेता और बड़े अधिकारी का साया रहता है और नौकरी जाने का दर बना रहता है,,क्योंकि संघर्ष करके नौकरी पाया और वही नौकरी उसके परिवार और बच्चो के भविष्य का आधार होता है,,उनके पास कोई खास पैत्रिक संपत्ति होती है|
मैंने अपने शिक्षण काल में खुद देखा है कि अगड़ी जाति के ज्यादातर लडके स्कूल में दादागिरी करते है,,कक्षा और विद्यालय और चौराहे पर मारपीट करते है ,,नेतागिरी करते है,,,यहाँ तक छोटी जाति के शिक्षक का अपमान करते है,,इसके वजह या तो उनका कोई चाचा ,,पापा या और कोई उस विद्यालय में मेनेजर ,  प्रधानाचार्य होता है,,,फिर उनके मार्क्स बढ़ जाते है,,परीक्षा में उनकी कापिया लिखी जाती है,,,
छोटी नौकरी तो उनके पांव पर रहती है,, बड़ी नौकरी में भी उनकी पैठ होती है,,कोई न कोई रिश्तेदार या राजनेता मिल जाता है,,,पहचान का,,,और एक अच्छा पद प्राप्त कर मौज करते है.
शायद आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाने की वजह और भी हो सकती है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज तेज हो रही है,,जिसमे बड़े अधिकारी और राजनेता जेल के अंदर जा रहे है और इनके चुने जाने के मौके कम हो रहे है,,मेह्नात  करने में कभी रूचि रही नहीं ,,,तो फिर इनको अपनी बादशाहत और एकाधिका छिनता दिख रहा है,,,दुःख होना लाज़मी है,,
दूसरी बात जो समझ में आती है वो ये है जिसको आज तक इन्होने अपने तलवे चाटते देखा है आज वही जो सामने कुर्सी लगा के बैठता तो निश्चित रूप से बुरा लग सकता है.

जहाँ तक कोई मुद्दा बनाने का सवाल हो,,,और किसी मुद्दे के खिलाफ आवाज उठाने का सवाल है मेरे हिसाब से इस दुनिया में सबसे आसान काम यही है ,,किसी व्यक्ति या मुद्दे की बुराई करना,,,क्योकि सविधान से विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है,,,
आरक्षण एक अचूक दवा है जो गरीबी और पिछडेपन ,,,तथा जातिवादी रुपी गंभीर समस्या का एकमात्र इलाज कर सकती है.
हमारे संस्कृति के निर्माता जातिवादी जहर बोया और क्या वजह है कि वह खुद जातिवाद का विरोध करना शुरू कर दिए है,,,और संविधान को दोषी मानते है कि संविधान में छोटी जातियों को रियायते देकर जातिवाद को बढ़ावा दिया गया, जिसके कारण आज हमें हर जगह अपनी श्रेणी और जाति लिखनी पड़ती है|
अगर वो येसा कहते है तो उनकी यह स्वार्थपरता है और कुछ नहीं | अगर जाति वाद के खिलाफ है तो क्या वह छोटी जातियों के साथ रिश्ते बना सकते है,,,कभी नहीं |
आज मीडिया समाचार पत्रों में जिन महँ भ्रष्ट नेताओ और अधिकारियो का नाम आया वे शायद अगड़ी जातियों से ही है |
आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाना एक सनक है,,जिसमे तुक्छ मानसिकता छुपी हुयी है| आरक्षण की पहल करने वाले जिन्होंने इसे अस्तित्व में लाया वे विद्वान थे और महान थे ,,युग श्रष्टा थे,,,चाहे वो वीपीसिंह या भीमराव आंबेडकर हो|
उन्हें आज हम प्रणाम करते है ,,,नमन करते है|

Saturday, February 11, 2012

समाज और प्रशाशन की पराजय


आप बिकुल थी कहते है अनुराग सर, चेन्नई की यह हृदयविदारक घटना से रूह कांप गए, मानो कि शरीर से प्राण पखेरू कुछ समय के लिए यमराज दरबार भ्रमण करने चले गए, जिस गुरु को कभी भगवान से पहले पूजा जाता था यानी भगवान से बड़ा मन जाता था, उसे कक्षा में चाकू और छुरियों से मारा जाता है और हत्या की जाती है, ये आपकी बात को पूरी तरह साबित करता है कि यह उस टीचर की हत्या नहीं वरन पूरे समुदाय और समाज की हत्या है,,यही समाज और समाज के लोग ये अध्यापक को नैतिकता और ईमानदारी का पहरेदार बनाते है,,राष्ट्र के भविष्य नियंता और निर्माता समझते है,,, समाज का अन्य हिस्सा चोरी करे ,, हत्या करे,,,झूठ बोले,,,रिश्वत ले,,,पर टीचर ,,,,कभी नहीं,,,मजाक और डपट के साथ दूसरा व्यक्ति कहते चूकता नहीं,,आप टीचर हो,, पढाते हो,,क्या पढाते होगे बच्चे को|

शायद टीचर उसे ही अपना भाग्य और नियति समझ लेता है,,आत्मग्लानी को पी जाता है,,आत्मा सिसकती है पर जुबान बंद रहती है,,,क्यों,,पता नहीं|

मैंने देखा है कि एक टीचर को स्कूल और स्कूल के बाहर झूठे आरोपों में उलझा कर मुक़दमा चलाया गया,,मीडिया को मसाला मिला ,,तिल का ताड़ बनाया कर प्रसारित किया,,टीचर की व्यक्तिगत,,पारिवारिक और सामाजिक जीवन का बाट लग गया,, आर्थिक स्थिति चूर चूर हो गयी,, उसके अपने भी उससे घृणा करने लगे,,,दूसरे लोगों की तो बात छोड़ दीजिए,,खिल्ली उड़ाते हुए बोलते है,,’देखो यही टीचर था जिसने वह बुरा काम किया था,,बेचारा टीचर सर झुकाए आगे निकल जाता है,, अपमान और आभाव की अग्नि में जलता हुआ,,कभी तो खुद को अकेले या खभी परिवार के साथ मौत के हवाले हो जाता है,,या फिर पागल हो जाता है,,,उधर बीस साल बाद मुकदमे का नतीजा क्या निकालता है,,,टीचर को निर्दोष है,, उसे बाइज्जत बारी किया जाता है,,,तब तक बहुत देर हो चुकी होती है,, टीचर की दुनिया तबाह हो चुकी होती है,,,लोगों के पास बचाता क्या है सिर्फ खोखली सहानुभूति ,,वह भी किसी काम की नहीं,,,येसा होता है समाज,,एसे होते है लोग,,,

और दूसरी चीज यह कि अगर कोई राजनीतिक हत्या या घपला या घोटाला होता तो राजनीती और प्रशासन इसे खूब चर्चित बनाता और भयंकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास करता ,,,और अगर किसी टीचर ने किसी बच्चे को थप्पड़ मर दिया होता फिर देखते मीडिया और प्रशाशन का कार्य कौशल ,,,पर येसे में कोई घर के बहार निकलना ही नहीं चाहता ,,सबको सांप सूंघ गया है,,

वैसे भी वर्त्तमान शिक्षा प्रणाली अतिशय उदारवादी और लचीली है,, जहाँ बच्चो को अधिकतम स्वतंत्रता देने की बाट की जाती है,,,स्वक्षन्द और उन्मुक्त वातावरण| माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी बार बार इस बात बार बल दिया की,,,शारीरिक या मानसिक दंड न्यायाचित नहीं है,,,पर समझ में नहीं आता कि एक टीचर की खुले आम नृशंश हत्या के बाद ये क्या कहना चाहेगे,,,कहेंगे भी क्या बस लीपापोती के आलावा|

आखिर शब्दों को मरोडने माहिर जो हैं|

इस वाकिया का टीचर समुदाय पर तो  बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ेगा,,,टीचर बच्चो से डर कर रहेगा,,यानी डरा डरा और सहमा सहमा,,तो फिर यह जग जाहिर की मन में दर या संशय बुधिमार्ग को बाधित कर देता है,,और आत्म विश्वास की कमी हो जाती है,, इस स्थिति में क्या अध्यन अध्यापन सुचारू रूप से चल पायेगा ,,कभी नहीं,,टीचर का भयमुक्त और स्वंतंत्र रहना अति आवश्यक है| निश्चित रूप से साक्षरता दर तो देश की सुधरेगी पर गुणवत्ता का आभाव होगा,,और समाज अव्यस्थित और अनियंत्रित रहेगा,,,नतीजतन सामाजिक बुरायियोंं और भ्रष्टाचार का बोलबाला होगा |

चूकि विद्यार्थी समुदाय एक नाजुक उम्र से गुजरता है तो निश्चित रूप से येसी घटनाओ के फिर होने की सम्भावनाये बलवती होंगी,,,क्योकि विद्यार्थी आवेश और ऊर्जा का प्रतीक होता है,,जहाँ उसके हर निर्णय आवेगातम होते है,,,

टीचर की गिरती सामाजिक स्थिति का अंदाज मुझे उस समय लगा जब मैं हाल ही में हीरो होंडा बाईक खरीदी और नंबर डालने के साथ बड़ी खुसी मन से बीच में लिखवा दिए ‘शिक्षक’ पर हुआ यूं कि जो भी देखता कहता कि आपको यह नहीं लिखवाना चाहिए था,,,यह एक या दो लोगों के द्वारा नहीं वरन लगभग पन्द्रह लोगों के द्वारा कहा गया,,तो मुझे पता चला ,,,कि आज का अध्यापक गुरुदेव नहीं वरन मास्टरजी बन गया,,जो अत्यंत पिछड़े पन का प्रतीक है,,,|

उस समय तो हद हो गयी जब एक हमारे जन पहचान के व्यक्ति अपनी बहा की शादी की चर्चा चला रहे थे तो उनके सामने बहुत सरे विकल्प रखे गए,,,डॉक्टर,,इंजीनियर,,,क्लेर्क ,,,पुलिस,,,फोर्स और अध्यापक,,,शायद आपको थोड़ी देर के लिए अविश्वसनीय लगे सुनकर कि उन्होंने क्या बोला,, जैसे ही अध्यापक का विकल्प उनके सामने आया और बोले पड़े ‘’मै अध्याप के साथ तो अपनी बहन का रिश्ता कतई नहीं करूँगा’’| इससे आप खुद अंदाजा लगा सकते है कि उनके इस कथन की पीछे क्या कारण हो सकता है,,,जो मुझे समझ में आता है,,कि अध्यापक के पास ऊपरी कमाई नहीं होती|

कुछ भी हो यह वाकिया बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय है,,टीचर की नहीं समाज की हर है,,टीचर तो अपना फर्ज अदा करते हुए शहादत को प्राप्त हुआ पर समाज और प्रशासन ने टीचर के ऊपर पाबंदियां लगा के रखी ,,शायद उसी कि परिणति हुयी है इस रूप में,,,निश्चित रूप से समाज पराजित हुआ,,,हर गया,,,क्योकि लाख कोशिश कर ले समाज और समाज के लोग पर उनके ऊपर लगा ये कीचड यह धब्बा मिटने वाली नहीं है|

Thursday, January 5, 2012

दह्शत और खौफदह्शत और खौफ

ये अलार्म भी बड़ी समय की पक्की होती है , ५.३० हुआ कि अपनी राग अलापने लगती है, पर क्या करे अलार्म तो लगाना ही पड़ता है, नहीं तो ८.०० बजे का स्कूल, देर हो जायेगे और प्रिंसिपल की सुबह – सुबह लेक्चर सुनना पड़ेगा| प्रिंसिपल की तो छोडिये , ये स्टाफ वाले पता नहीं क्या भनभनाने और बुदबुदाने लगते है कि ‘देखो यही स्टाफ क्वार्टर में रहता है फिर भी देर से आ रहा है, इतना ही नहीं , प्रार्थना में खड़े भारत के नौनिहाल भी घूर घूर के देखते है , यूं लगता है कि जैसे हर कदम के बीच का फासला नाप रहे हो ‘ ये देखो छोटे कदम , ये बड़े कदम, क्या चलने की स्टाईल है ,आज नया शूज पहन के आया है , कोई कहता है|

पर क्या आज विद्यालय १० बजे का है , भगवन शुक्रिया, अभी थोडा और सो लेता हूँ, फिर रजाई के अंदर सिमट गया , और जैसे ही नीद लगाने को थी कि फोन की घंटी बजी| लगभग ७.३० बजे थे , कौन शुभ्चिंतक ब्रम्ह मुहूर्त में याद किया , देखता हूँ| घर का फोन , अब कैसे न रिसीव करता , आधी नीद में बोला,’ हेलो’

उधर से तुरंत जबाब आया जैसे कि पहले से सवालों का पिटारा तैयार करके रखा गया हो, ‘तुम ठीक तो हो ?’’

‘हाँ मै ठीक हूँ, क्यों क्या हुआ?’ मैंने थोड़ी उतुसुकता में पूछा|

फिर क्या मेरी बाट लगानी शुरू हो गयी| मै कुछ बोलना चाहता पर कहाँ, बोलने का मौका मिलने वाला था.|

‘तुम्हे कुछ होश रहता है , तुम्हे इतनी बार फोन किया रात में, और तुम फोन क्यों नहीं उठाया , हम लोग रात फर सो नहीं पाए , घर के बाहर बैठे रहे , पूरा गाँव और पूरा परिवार घर के बाहर बैठा रहा, तुमको फोन पर फोन लगाये जा रहे है पर तुम हो कि फोन उठाते नहीं, फिर फोन देखने के लिए रखा है जब रिसीव नहीं करना है तो फोन फ़ेंक दो किसी कूड़े में और रहो बिना फोन के ‘

‘पर ‘ मैंने बात काटकर कुछ पूछने का प्रयास किया पर कोई फायदा नहीं|

उधर से नानस्टाप डट फटकार और इधर मै बेबश और लाचार|

मै तो स्कूल दस बजे होने का जश्न मना रहा था कि ये सुबह कि ये नौबत और दमदार लताड़ , और मै नहीं समझ पा रहा कि ‘फोन न उठाने कि इतनी बड़ी सजा दी जा रही है’ जरूर कुछ बात है|

और फिर क्या उधर से धीरे –धीरे आग के गोले और शोले जो अभी तो भड़क और धधक रहे थे वो ध्रुव प्रदेश के ठन्डे चादर बन गए और वास्प बनकर बरसाने लगे, सिसकी आने लगी, मेरा मन भी सिहराने लगा ‘ये भगवन ! घर पे कही कोई अनहोनी तो नहीं हो गया, पर अभी शाम को मैंने फोन किया था , सब कुछ ठीक ठाक था , घर में कोई बीमार भी नहीं था, और गांव में कुछ किसी के होने से इतना रोना और डट फटकार , नहीं होगा , कही रिश्तेदारी में कुछ तो नहीं हो गया|

उधर से सिसकी और इधर मन में सारी बाते गूथ रही है|

हिम्मत भी नहीं पड़ रही कि क्या हुआ | आखिर कौन चाहेगा कि सुबह सुबह कुछ अनहोनी और अप्सगुन खबर मिले,

पर मै उसे नकार भी नहीं सकता था| मन में शांति भी नहीं मिलेगी , दिल कांपने लगा, रूह सिहरने लगा, धड़कने तेज हो गयी, आंख नम हो गयी , शरीर बेजान सा हो गया , हाथ पाव सुन्न हो गए , येसा लगा कि फोन हाथ से टपक जायेगा|

फिर सिसकियों के बीच से आवाज आयी और मै बिलकुल ध्यानमग्न हो गया ,पहली बार जिंदगी में कुछ इतना गौर से सुना, शायद बडो की बात इतना ध्यान से सुनता तो आज बड़ों की तरह बड़ा बन जाता, और क्लास में गुरूजी की बात ध्यान से सुनता तो ये दिन न देखने पड़ते, जा आज कल देखने पड़ रहे है,

‘मालूम है कल रात के तीन बजे खबर मिली कि धरती फटने वाली है, चूंकि सर्वबिनाश की २०१२ में चर्चा पहले से चली आ रही थी, खबर मिलते ही सभी  गाँव के लोग शोर मचाते और घर पड़ोस को उठाते घर के बाहर आ गए, और खबर थी कि ठीक ४-२० पर धरती फटने वाली है.,जब पूछा गया कि आपको कैसे पता चला, तो सबने बताना शुरू किया कि ‘ मुझे मुंबई से फोन आया, मुझे दुबई से फोन आया, मुझे देल्ही से फोन आया.’| और तब से मैंने तुमको सैकडो बार फोन लगाया पर तुम उठाये नहीं, तो येसे लगा कि जिस वाहन भूकंप तबाही मचा चूका हो|’

फिर जैसे शरीर से निकली हुई आत्मा आधी दूरी से पुनः लौट आयी हो, और जान में जान आ गयी हो|

मैंने गहरी साँस लेते हुआ बोला’ ‘नहीं माँ ,येसी कोई बात नहीं है , यहाँ पर कुछ भी नहीं हुआ है, और यह केवल अफवाह थी लोगो के अंदर दह्शत फैलाने कि और कुछ नहीं|’

फिर घड़ी कि तरफ निगाह गयी ,’ अरे ये क्या,९.३० हो गया , अभी तक ब्रुश नहीं किया , ठीक है माँ, मुझे स्कूल जाना है, लेट हो जाऊँगा, हाँ लेकिन चिंता मत करना , मै बिलकुल ठीक हू, अपना ख्याल रखना, और भैया को लेकर डॉक्टर के पास चली जाना. अभी फोन रखता हू माँ,, नमस्ते|

पर एक बात मेरे दिमाग में गूजती रही कि ये अफवाह कौन फैलाया और क्यों फिलाया| पर एक बात तो तय है कि जिस किसी का भी हात इसके पीछे था , उसकी मानसिकता देश के प्रति ठीक नहीं है|

क्या हासिल करना चाहता था लोगों में दह्शत और खौफ का बीज डालकर| ये किसी आतंकवादी से कम नहीं है|



०४/०१/२०१२


Tuesday, November 22, 2011

“Present education system has been able to create successfull and cultured citizen in the country


The people may say that going in the school, attending coaching centers or getting tutor at home is education. Education is something which makes us man out of animal. We are entitled to be called civilized and developed race of the planet. We not only get education in the so called formal institutions and the hub of educational centers but the life moving around ourselves too are the richest source of education. The raw mind gets ripened out of education that enables us to live the over laden life smoothly and successfully. It’s merely education that has resulted human race into present age of machine and technology from primitive nomadic state.

But the big question whether present education system has really created cultured and successful citizen poses a big challenge in front of us. We have to analyze in the mirror of the education system of our ancestors and forefathers. If we agree with the topic we have to concede that the conventional education has no power create successful citizen. I favor the idea that every education system is the result of the time and life in it. From the early stage of human life , there has been different mode of education, and in the process of development it went on getting accustomed with the changed scenario. Every time there has been people who remained stick to the bygone habits and the people hugging the changes. Its really noticeable that ‘ change is the law of nature, there is no beauty without change’. We could not have hoped the use of computer and mobile, aeroplanes and sophisticated machines from the primitive uncivilized men, but we must agree that what we are today is the result of our forefathers inventions and discoveries. Today searching of the newer planet seems sensational but in those days , the invention of fire, wheel and pots were not less sensational. They have been the backbone of all today’s development. What newer things we are developing today will become of secondary importance after centuries ahead. The invention of fire would have really dazzled the nomadic people. They would have got burning spot to their bodies but later they utilized the same for their advancement in sphere of human life like making the sharp weapon for hunting, to save them from wild beasts, to cook the food etc.

The invention of the wheel lessened the burden of the back of the man. The animals were being used to carry the goods from one place to another. The society started assuming form. And the race of development quickened. The fire and the wheel is the reason why we are making synthetic materials today.

How can we say that only the present generation citizens are to be called successful?  Was chanakya and Chandra gupta no successful? Was ashoka , the great a failure? Was napoleon and Alexander, the great only the puppet? Was mihirsen, aryabhatta, sushrut of no importance.

Its foolish to say that only present generation education system has potential to inculcate the cultural values.

Think about Mahatam Budha and Mahabira Swami, they taught the morals to the world.

There is only one thing to say in this regard that every education system has limitation of the age and circumstances , but it has its importance at least in the associated era. It may be replaced by the newer ideas and concepts, but it can never lose its worth.

Wednesday, October 19, 2011

Universal brotherhood is more valuable than patriotism


Against the motion

Honorable judges, jury members, teachers and my dear friends, today I am here to express my views against the most debated topic ‘universal brotherhood is more valuable than patriotism.

It’s not merely for speaking sake but in reality I do firmly believe and support my side and I feel really very sorry how my worthy opponent stands in favor to glorify the importance of universal brotherhood. As I think it’s a nominal false pretention to protect the side somehow. If it’s not like that, then can I get an answer?, ‘ If there is fire in the village and his/her house too is on ablaze, whose house will he save first’ as I believe that the answer will be ‘ own house’. Another situation I would like put in front of him/her, if the team won any trophy, and his/her brother was one of the team member, whether he/she will celebrate the victory of team of her brother, certainly the victory of her brother will be more important than the victory of the team.

Under the light of these references I merely intend to emphasize that in theory whatever may be, but in practical life, an individual is above all sorts of universal convictions and false promises.

Just think, how can a hungry man fulfill the stomach of another one? How can a man donate the needy persons lavishly if his own bank account goes nil. I would like to entreat my worthy opponent to go and ask a beggar on the footpath ‘what does universalism mean?, for him two times meal is more important than any concept or ideology. There is another big hindrance in the path of universal brotherhood. Can a man fiercely entangled in the personal problems solve others problems? I say never. I firmly contradict the idea of creating the beautiful platform of universal brotherhood where every human being will be treated equally like brothers. I do believe it’s merely mirage in the deserts never going to be fulfilled. I think patriotism is not merely a reverence to the nation but it’s religion, it’s culture and moreover it’s above all goals of livings.

My worthy opponent claims to bring equality and fraternity in human race through universal approach and ideology while he/himself might be well aware of the fact that it’s never possible as ‘difference lies in the very nature of man’. There is large scale differences among human race in color, climate, lifestyle, belief, caste and creed. These reasons had been the factors of conflict between different communities. The European countries captured the other countries and tortured brutally their original people and squeezed its natural resources. They consider themselves more civilized species of earth. In that case it’s nightmare to think about universal brotherhood.

It’s not the first time in human history to think about universalism. The great souls like Lord Christ in Europe, jarthustra in West Asia, Confusiaus in China and Gautam Budh , Mahabir Swami in South Asia propagated the idea of love to human beings but today there sermons and preachings are lied buried in the books or in the temples only. Communal riots. Long list of conversion, by avarice, trick or by force. They cry the slogan of one god and all sons, but the same has bifurcated and are fanatic and orthodox of their own belief. Even in the modern world of science and technology the superstitions prevails strongly.

 India too had extended hands of brotherhood with China in the year 1962 with slogan ‘Hindi Chini Bhai Bhai’ but in return how China responded, we all know very well, the attack on the poorly equipped souldiers in the regime of Pt Neharu. We also know what Atal Bihari Bajpai got in return after his visit to Pakistan in 1999, the Kargil War.

It’s not problem of India or its neighbouring nations, there is hardly any country which is not having the boundary issues.  The long running conflict between Isarael with philistine is widely known. Every country has some lasting challenges in its domain like naxalism, moaist, minority , racism, regionalism, language and many more internal issues. As long as these issues are not solved our effort to universal brotherhood will be in vain.

I grieve at the idea of universal brotherhood when I see the strong hold and dominance of a few so called developed countries over the world organizations like UNO, IMF, UNICEF,UNESCO and many more. Although these organizations are constituted with notion to benefit all human beings but they are headed and governed by the powerful developed countries like USA, Britain and others. The world’s second highly populated country India could not secure a permanent seat at UNO till now. The dictatorship of the lead nations we have seen everywhere. For their own benefit, they twist the rules and execute accordingly. They have their covetous eves over oil store in west Asian countries, and to tighten the hold on these countries, either they are attacking by themselves on false accusations or promoting internal conflicts to weaken them. Today almost all the developed countries devise to have strong hold over world economy, they have the hawk eye for being the leader in the world market by hook or by crook. The developing countries have to be sufferer in it.

If there is equality all around the world then I surprise to say why are there so many disparities  among currencies of different nations like dollar, rupee, euro, yuan, dinar and so on. The attack over Indians in major countries like Australia and America and step motherly temperament of so called developed countries exemplify their hidden notions.

       Another thing that is striking my mind is that if one stabs another man right in the belly through the dagger and later says that, let’s forget our enmity and be noble friends, can the wounded fellow extend the hand in friendship?,  I say ‘never’.  Can Japaneese forget the Hiroshima and Nagashaki event, Can the world’s notorious dictators like Hitler , Napolean and Mousolini and Bismarked be excused, I say ‘No’. Can Russia ever be friend of America, can World forget what Germans did in world war. Or can Germans ever forget what injustice so called countries in League of Nations did. Though the wars are over today, but the pots are boiling everywhere.

 I mean to say ‘It’s act of not any single country but cooperation of every nation, and that is as I believe never practicable.

       Moreover, If patriotism values nothing then What is use of celebrating independence day and republic day with pomp and show. Throw away the false crying over the slogans of JAY HIND, DILLI CHALO, TUM MUJHE KHOON DO MAI TUJHE AAZADI DOONGA so and so. Forget Bhagat Singh , Mahatma Gandhi and Subhas Chandra Bose.

       In this regard I think to quote the lines of famous American poet Mark Twain that ‘East is East and west is west, and never twain can meet together.’

       Thank you

       Jay Hind Jay Bharat








Friday, September 30, 2011

विश्वास के साथ खिलवाड़


मेरे घर के द्वार पर औरतो का जमघट, जैसे कई मधुमखियाँ पुष्प का रस इकठ्ठा करने की होड में लगी हो | वैसे भी औरतो का जमघट कुछ बिशेष अवसर पर ही होता है , बेचारियो कों घर के काम से फुरसत मिले तो न , ऊपर से पति जी का रुआब, सासूजी का डंडा, ससुर जी का फरमान कम थोड़ी होता है |

‘अरे गुरूजी कों ठीक से बैठने तो दो’ मेरी माँ ने कहा , लगता है तुम बाबाजी के सर पे बैठ जाओगे ‘

साधुजी अपने  एक चेले के साथ मेरे गांव पधारे और उनकी डमरू की दैवीय ध्वनि से गांव के समस्त नारी समूह इकट्ठा हो गया| लगभग ४० घरों की पूरी बस्ती जो डेढ़ किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है | शायद किसी और अवसर पर औरतो की इतनी भीड़ जुटे , पर आज तो येसा लगा जैसे इन्द्र सिंहासन की बोली लगने वाली है|

मेरी माँ बहुत सादर और सम्मान के साथ चारपाई बिछाई और साधुजी कों बैठाया जैसे वो साधू नहीं खुद ब्रह्मा हो|

मेरी माँ धर्मभीरू और विश्वासी प्रकृति की है जो तथाकथित शगुन और अपसगुन पर पूर्ण विश्वास रखती थी, उन्हें साधू बचन और ओझा मन्त्र कुछ जादा ही पसंद था और कभी – कभी हमारे तार्किक सोच की बात लगा देती थी|

मै साधुजी के चेले के साथ लगभग २०० मीटर दूर , अमरुद के पेड़ के नीचे बैठ गया और चेले से हल्के मन से बातचीत शुरू की|

शुरू हुआ बाबाजी का जादू और करिश्मा ,पीट वस्त्र ,लंबी दाढ़ी, गले और हाथ में माला था कमंडल, बगल में एक जादुई थैला |

‘बाबा मेरा हाथ देख लीजिए , एक औरत बोली | मुझे भूख नहीं लगती , गाय मर गयी, खेत सूख गया , पति की कमाई नहीं हो पा रही है , बेटा कुछ उखडा सा रहता है , इस साल हमारे घर में बीमारी ने घर जमा लिया |

बाबा ने हाथ देखा और बोला ‘पुत्री! तुम्हारे ऊपर शनि देव का प्रकोप है , ग्रह स्थिति खराब है, पेड़वा दैत का शाया है|’

औरत बोली , ‘बाबाजी ! कब तक येसा रहेगा , कुछ उपाय बताइए |’

बाबा ने हाथ कों तेजी से झटका , आंखे मूदी, सर दो झकझोरा , जैसे बाबाजी कों मिरगी की बीमारी हो , और कभी-कभी  झटका आता हो , कुछ बडबडाया और उचक कर बोले , “ तुम्हे प्रतिदिन सूर्योदय के समय पीपल पर पानी डालना पड़ेगा लगातार तीन सप्ताह , पांच व्रत रखने होगे , एक बार वैष्णवदेवी का दर्शन करना होगा , लगातार दश मंगलवार ब्राहमण कों कों भोजन कराना होगा , तभी तुम्हारे जीवन में सुख समृधि आ सकेगी’|

बाबाजी के उपाय कों पूरी तनमयता से औरत सुनती रही , पर शायद ही वह इतने अनुष्ठानो कों याद रख पाए |

पर छोडिये , आपको आगे का दृश्य दिखाता हूँ,

औरत सहमे हाथो से बाबा जी का पैर छुआ और चढावा देके चुपचाप चल दी , जैसे की पिछली मुसीबत से बढ़कर कोई बड़ी मुसीबत मिल गयी हो|

हम चेले के साथ हल्के बातचीत करते रहे , थोड़े दूरी से पर स्पष्ट रूप से पूरा नजारा देखते रहे |

‘तुम लोग हटो , मुझे भी कुछ पूछना है बाबाजी से, मेरी माँ बोली |

माँ ने घर के बारे में पूछा , घर के और सदस्यों के बारे में पूछा , फिर मै घर का सबसे छोटा , पर नटखट नहीं , सबसे दुलारा , तीन बड़े भाई और एक बड़ी बहन , तो भला हमारे विषय मै पूछना कैसे छूट सकता था |

पूछने की संभावना और भी बढ़ जाती है , जबकी मेरी माँ रुढिवादी  परम्पराओं , दैवीय प्रकोप ,भूत चुड़ैल , साधू – ओझा जैसी चीजों पर पूरा विश्वास रखती हो| इस बात का जब कभी हम तर्क – कुतर्क करते तो , अच्छी खासी डाट पडती | दो अच्छर पढ़ क्या लिए की ज़माने से आ रही मान्यताओ का इनकार करने लगे जैसे की हमारे पूर्वज बिलकुल पागल थे | आखिर माँ है , इसलिए हम चुप हो जाया करते |

माँ ने साधुजी से विनयपूर्वक पूछा , ‘ मेरे बेटे के विषय में बताइए गुरूजी , उसे नौकरी मिलेगी की नहीं|’

साधुजी आत्मविश्वास से सराबोर , अपनी जादू की छड़ी हवा में लहराई , सर कों झनझनाया और दमदार आवाज में बोले , ‘ नौकरी का संयोग तो था पर , लड़का आठवी की पढ़ाई कर छोड़ दिया , इसलिए कोई सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती|’

मेरी माँ ने एकाएक मेरी तरह असहाय निगाह से देखा और मैंने इशारा किया और पूछो |

माँ ने लड़खड़ाते स्वर में बोला , ‘ लड़के के शादी के विषय में कुछ बताइए गुरूजी |’

जहा तक मुझे मालूम था की किसी साधू से हाथ दिखाना और कुछ पूछने में सर्व प्रिय विषय शादी ही होता है |

साधुजी कों अपनी प्रखर ज्ञान पर अटूट विश्वास था और शायद इस बात का उन्हे घमंड भी था की वह किसी के जीवन के विषय में वे उस सम्बंधित व्यक्ति से ज्यादा जानते है |

अपने चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने कहा , ‘एक पत्नी है और एक बच्चा , पत्नी गर्भवती है , पूरे तीन बच्चे का संयोग है , इस समय पत्नी मायके में है|’

बाबा जी का हर शब्द जैसे मेरी माँ के मस्तिष्क कों झकझोर रहा हो ,कभी बाबा कों देखती और कभी मुझे , और मै सब सुन कर अनसुना करता रहा  जैसे की यह नाटक मैंने पहले देख रखी हो , आसपास खादी पड़ोस की औरते भी आश्चर्य से बिलकुल हक्का बक्का | पर साधुजी तो अपनी सफलता के धुन में मस्त , पर चेले के मन में स्थिति के प्रति आशंका |

मेरी माँ जैसी किसी पिजड़े से शेर कों छोड़ दिया जाय , वैसे कड़ी आवाज में बोली ,’ साधुजी आप क्या बोले जा रहे है , आप क्या कह रहे हो|’

फिर क्या, बाबा येसी अप्रत्याशित आवाज कों सुन के एकाएक अपनी आँखे खोली और बदले हुए चेहेरे तथा माहौल कों बिलकुल महसूस किया | उनके आँखों में आत्मविश्वास की चमक जाती रही , चारो तरफ नजर घुमाया , चेले कों देखा , चेला भी कुछ आशंकित , पर दोनों कों कों कुछ पता नहीं की समस्या कहाँ है , बिलकुल किन्कर्ताव्यविमूध|

साधुजी ने मेरी माँ से दबे स्वर में कहा , ‘क्या हुआ पुत्री ?’

माँ ने झगडते हुए बोला , ‘ आप साधू हो , आप कों नहीं मालूम क्या अनाब- सनाब बोले जा रहे हो , मेरा बेटा कक्षा आठ तक पढ़ के छोड़ दिया , एक पत्नी और एक बच्चा , पत्नी गर्भवती , पूरे तीन बच्चे का संयोग ,और क्या बोला की सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी |

अब कौन रोक सकता था मेरी माँ कों अगर एक बार बरसना शुरू हो गयी , और उधर कभी साधू शिष्य कों देखता , शिष्य मुझे देखता , फिर शिष्य गुरु कों देखता| पास खादी औरते वस् तमाशा देख रही थी की अब क्या होने वाला है|

माँ ने कड़े स्वर में बोला , ‘मेरा बेटा अभी पढ़ रहा है , प्राथमिक विद्यालय में सरकारी टीचर है , शादी अभी हुयी नहीं , बच्चे तो बहुत दूर की बात और तुम क्या कह रहे हो उल्टा सीधा |

इतने कहते ही साधुजी की रही सही हिम्मत और मान ढहने लगा और सिहरते हुए बोले , ‘देखिये कभी-कभी गलती हो जाती है , मै फिर से देखता हू और तुरंत उन्होंने अपने जादू के थैले से कोई चिथड किताब निकाली  और चश्मा लगा के किताब में बिलकुल घुस सा गए जैसे कई किताब पढाने की आड़ में अपना चेहरा छुपाने का प्रयास कर रहे है  और कुछ देर बाद कुछ लार्बराते और लड़खड़ाते आवाज में बोलने का प्रयास किये पर तब तक देर हो चुकी थी , और उनकीआँखों में अपराध बोध स्पष्ट झलक रहा था |

मेरी माँ ने तुरंत लताडते हुए बोला , ‘आपकी भलाई इसी में है के आप अभी उठे और चल दे चुपचाप|’

साधुजी कों येसा करना उचित था और वैसे किये भी | अपना कमंडल छड़ी तथा थैला उठाये चल पड़े |

पर किसी कों मालूम नहीं की ये सब कैसे हो गया | न तो साधू कों , न तो इकठ्ठा हुयी औरतो कों और न ही मेरी माँ कों ही | अगर मालूम था तो सिर्फ दो लोगो कों – मुझे और शिष्य कों |

आइये बताता हू कैसे |

शिष्य मुझसे अनमने स्वर में बोला , ‘ आपको येसे नहीं करना चाहिये था |’

‘मैंने क्या किया, मंद स्वर में मैंने बोला|

शिष्य थोडा तगड़े स्वर में बोला , ‘आपने झूठ क्यों बोला?’

मै आत्म विश्वास के साथ उत्तर दिया , ‘ मैंने जानबूझकर झूठ बोला’

शिष्य ने फिर कहा , ‘ क्यों?’

मैंने कहा , ‘मेरे झूठ बोलने से क्या फर्क पड़ता है , अगर आप वास्तव में स्थिति प्रज्ञा है यो झूठ कों पकडिये और सही चीज बताईए |’

जब तक की शिष्य मुझसे बाते करता रहा , गुरूजी सर झुकाए , मन मंथन करते काफी आगे निकल गए , और फिर शिष्य भी तेजी से चलकर उनके पीछे लग गए | दोनों के मन में भारी अवशाद , शायद सुबह उठाते समय उन्होंने ये कल्पना भी नहीं की होगी की कुछ येसे होने वाला था |

हुआ यूं कि मै थोड़ा दूरी पर अमरूद के पेड़ के नीचे शिष्य के साथ हल्के मन से बाते कर रहा था|

तभी शिष्य ने मेरे विषय में कुछ पूछना शुरू किया , पता नहीं क्यों मेरे मन में शरारत या शंका वश कुछ अजीब सा प्रयोग करने की सोची , मेरे मन की शंका उस समय और बढ़ गयी जब शिष्य मेरे विषय में कुछ पूछता फिर अपनी भाषा में गुरूजी से कुछ बात करता , वही मैंने निश्चय किया कि देखता हू क्या होता है और जो भी उसने मेरे विषय में पूछा सब उलटा या गलत बताया , फिर क्या --------परिणाम आपके सामने था |

पर क्या मै ईशवरीय शक्ति में विश्वास नहीं करता हूँ ,मुझे मालूम नहीं , करता भी हूँ और नहीं भी |