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Tuesday, September 15, 2026

कथन की समझ और गहराई

बात है, जब मै कक्षा सात मे पढ़ता था। बहुधा, प्रार्थनासभा समाप्त होने के उपरांत प्रधानाचार्य श्री धर्मराज यादव जी के द्वारा जीवनोपयोगी सीख और सुबचन अवश्य दिया जाता था। उनकी सभी बातों मे एक अविस्मरणीय बात, जो अक्सर मेरे कानों मे जस की तास गूँजती है और समय-समय पर मन की अनंत गहराइयों मे तरंगित होकर सतह पर आती है और उसके अंतर्निहित संदेश पुनर्जीवित होकर मार्ग प्रशस्त करते हैं। 

बात है कि हमे अपने आप को साफ सुथरा और शुद्ध रखना चाहिए। उन्होने आगे कहा कि हमे अपनी बाहरी सफाई से जादा महत्व और ध्यान अंदर की सफाई पर देना चाहिए। 

कक्षा सात मे पढ़ने वाला विद्यार्थी लगभग 12-13 साल की उम्र का होगा। विद्यालय मे साफ सफाई का अधिकतर आशय अपने गणवेश को शुद्ध रखना समझा जाता है। मैंने भी अमूमन यही समझा। अंदर की सफाई को मतलब हम अन्तः वस्त्रों जैसे बनियान को समझा। 

समयान्तराल मे कुछ समझ विकसित होने के साथ समझ आया कि अंदर की सफाई का मतलब अपनी त्वचा को साफ रखना यानि दांत, नाखून, बाल के नियमित काटने के साथ रोज स्नान करना। समय बीता और समझ आया कि अंदर की सफाई मतलब शरीर के अंदर अंगों की सफाई जैसे फेफड़े, हृदय, लिवर, किडनी, आंते इत्यादि। 

अंदर की सफाई की समझ का अगला पड़ाव था, ‘अन्तर्मन और अंतरात्मा की सफाई’। यानि हमारा मन, विचार, वाणी और कर्म विशुद्ध होने चाहिए जिसमे ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लालच और दुर्विचार की जगह प्रेम, सद्भाव, सहयोग, श्रद्धा, करुणा और सुविचार होने चाहिए। 

बात और परस्थिति एक है पर उसके आयाम अनन्य। सतह से सम्पूर्ण सागर एवं महासागर समतल दिखाई देते हैं पर उसमे अनंत गहराई अंतर्निहित होती है। 

कोई भी क्षण, वस्तु, परिस्थिति या कण सामान्य नही है, सबकी अकल्पनीय और अगम्य गहराई होती है। गोचर और अगोचर प्रत्येक कण, उस विशालकाय ब्रह्मांड का ही एक रूप है। कण और ब्रह्मांड एक ही है। सतह और गहराई भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 

एक सामान्य सा दिखने और लगने वाला कथन अपने मे असामान्य भाव, अर्थ और आयाम लिए होता है।       

लाल चंद्रा 

प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय, जीसी सीआरपीएफ़ सिलीगुड़ी 

Thursday, September 10, 2026

बधाई हो, बधाई।

जनम की शुभ घड़ी आई,
खुशियां हर तरफ छाई; 
कलियों की खुशबू से खिली खुदाई।
बधाई हो बधाई, बधाई हो बधाई।

तेरे चेहरे का नूर,
रहे चमकता भरपूर;
तेरा जीवन हो जगमग,
रहे हर गम से दूर;
खुशियों की बजती रहे शहनाई।
बधाई हो बधाई, बधाई हो बधाई।

दुआ मेरी है बस,
तेरे सपने हो सच;
हो हासिल हर हसरत,
हो पूरी सब चाहत;
खुशियों की मिलती रहे बधाई।
बधाई हो बधाई, बधाई हो बधाई।



Saturday, August 15, 2026

एक नन्हा सा बीज

एक नन्हा सा बीज,
विराट वृक्ष बनता है।

कुछ छिटपुट पानी की बूंदे, 
कुछ अदना सा प्रकाश;
थोड़ी सी धरती की धूल,
हल्की हवा और खुला आकाश; 
ऐसे पाल्य परिवेश में बीज,
पलता, उभरता, संवरता, विशाल वृक्ष बनता है।

धरती के गर्भ में, 
पलता है;
मिट्टी में मिटता है,
टूटता है, बिखरता है;
फिर प्रस्फुटित होता है,
अंकुरित होता है;
नाजुक सुकुमार पौध से, 
मजबूत महाकाय वृक्ष बनता है।

आसान नहीं, 
बीज से वृक्ष का सफर;
अत्यंत शीत ,भयंकर गर्मी,
अंधड़ तूफान, भारी बारिश का कहर;
झुलसता है, कांपता है, झेलता है, संभालता है;
फिर कहीं, एक अदना सा बीज;
छायादार, फलदार वृक्ष बनता है।