विराट वृक्ष बनता है।
कुछ छिटपुट पानी की बूंदे,
कुछ अदना सा प्रकाश;
थोड़ी सी धरती की धूल,
हल्की हवा और खुला आकाश;
ऐसे पाल्य परिवेश में बीज,
पलता, उभरता, संवरता, विशाल वृक्ष बनता है।
धरती के गर्भ में,
पलता है;
मिट्टी में मिटता है,
टूटता है, बिखरता है;
फिर प्रस्फुटित होता है,
अंकुरित होता है;
नाजुक सुकुमार पौध से,
मजबूत महाकाय वृक्ष बनता है।
आसान नहीं,
बीज से वृक्ष का सफर;
अत्यंत शीत ,भयंकर गर्मी,
अंधड़ तूफान, भारी बारिश का कहर;
झुलसता है, कांपता है, झेलता है, संभालता है;
फिर कहीं, एक अदना सा बीज;
छायादार, फलदार वृक्ष बनता है।